April 5, 2020

विश्व उपभोक्ता दिवस पर बिहार में दिखा ‘जागो नहीं, भागो ग्राहक भागो’!

टीवी चैनल पर जब भी कोई कार्यक्रम देखने बैठे तो विज्ञापन के दौरान जागों ग्राहक जागो का विज्ञापन जरूर आता है। जो दर्शकों को कई बातों का ज्ञान दे जाता है और साथ ही उपभोक्ता को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक कर जाता है। आज यानी 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता दिवस पर इसकी चर्चा होने लगी है कि लोगों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूकता कितनी जारूरी है और उससे क्या लाभ मिलता है।

लेकिन विश्व उपभोक्ता दिवस पर बिहार के जिला उपभोक्ता फोरमों की जब हालत देखी जाती है तो तरस आता है। क्योंकि सूबे के ग्रहकों से संबंधित मामले देखने के बाद ग्राहकों को भगाने वाला अनुभव आता है। अगर बात सिर्फ राजधानी पटना के उपभोक्ता फोरम की करें तो यहां 4500 केस पेंडिंग हैं। जबकी प्रदेश में ऐसे 20,000 कंज्यूमर फोरम की दौड़ लगा रहे हैं। क्योंकि कहीं अध्यक्ष हैं तो सदस्य नहीं और कहीं दोनों सदस्य हैं, लेकिन अध्यक्ष नहीं रहने के कारण फैसला नहीं लिया जा पाता है। जिसके बाद फैसला नहीं होता देख नराज 17 जिलों में इस साल एक भी फैसला नहीं आया है।

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वहीं सूबे में उपभोक्ता फोरम की हालत को अगर जिलावार देखें तो सभी जिलों की हालत पूरी तरह से खास्ताहाल है। और यहां जब भी जाया जाता है तो लगता है कि उपभोक्ता फोरम का हाल जागों ग्राहक जागों नहीं बल्की भागो ग्राहक भागो।

नवादा, बांका, समस्तीपुर, शेखपुरा, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी,नालंदा, कैमूर में मात्र 8 अध्यक्ष और 1 सदस्य है यहां किसी भी एक व्यक्ति के अवकास पर जाने पर फैसला नहीं हो पाता है। जबकी किशनगंज, औरंगाबाद और पटना में अति. प्रभार, मधुबनी, बेगूसराय, आरा में अध्यक्ष नहीं है जबकी सदस्या हैं तो यहं बिना अध्यक्ष के सदस्यों को फैसला देने का अधिकार नहीं। वहीं पूर्णिया, रोहतास, भागलपुर, सीवान, मुंगेर, सहरसा, छपरा, गया में अध्यक्ष है लेकिन यहां एक भी सदस्य नहीं होने के कारण फैसला दिया जाना संभव नहीं है। वहीं शिवहर, गोपालगंज, अररिया, बेतिया, अरवल में फोरम तो है पर यहां का फोरम बेकरा पड़ा हुआ है क्योंकि यहां के जिलों में एक भी सदस्य नहीं है जिसके चलते यहां केस करना ही बहुत मश्किल सुनवाई तो दूर की बात है। हलांकि बिहार के 7 जिले खगड़िया, बक्सर, जमुई, सीतामढ़ी, कटिहार, दरभंगा, सुपौल ऐसे हैं जहां उपभोक्ता फोरम के सभी सदस्य है। यानी की इन 7 जिलों को बहुत ही भाग्यशाली माना जा सकता है। वहीं कई ऐसे जिले हैं जहां कहीं अध्यक्ष है तो कहीं सदस्य नहीं इसलिए फैसला तो दूर की बात है।

राज्य में कितना फैसला लेने में सफल रहा फोरम ?

अब बात अगर यहां होने वाले कम को लेकर करें तो बिहार के 17 ऐसे जिले हैं, जहां इस साल फैसला नहीं जिसमें वैशाली, मधुबनी, बांका, रोहतास, खगड़िया, शिवहर, बेगूसराय, भागलपुर, गोपालगंज, अररिया, सीवान, बेतिया, मुंगेर, सहरसा, अरवल, छपरा और लखीसराय शमिल है। अब सवाल उठता है कि जब उपभक्ताओ का संरक्षण ही नहीं हो पाएगा वहां व्यवसायियों की मनमानी तो लाजगी है।

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हलांकि जब इस सवाल को लेकर खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री मदन सहनी ने कहा कि पटना समेत जहां अध्यक्ष नहीं हैं, वहां के लिए नियमावली में संशोधन के कारण दोबारा प्रक्रिया शुरू कराई गई है। अप्रैल के पहले हफ्ते तक सारे पद भर दिए जाएंगे। सदस्यों की नियुक्ति तो की गई थी। जहां नहीं हैं, उनका रिव्यू करेंगे। पटना के लिए देखता हूं कि डबल बेंच के लिए क्या किया जा सकता है। उपभोक्ता वाद से जुड़े दस्तावेजों को सहेजने, फाइलों के हस्तांतरण, नोटिस आदि की प्रक्रिया के लिए स्टाफ भी नहीं हैं। पटना में 38 में से 25 पद खाली हैं। नवादा में 10 में 9 तो, मधुबनी में 12 में 8 पद खाली हैं। बाकी जगह भी यही हाल है। इससे समझा जा सकता है कि बिहार में क्या चल रहा है यहां उपभोक्ता फोरम का वह स्लोगन जागो ग्राहक जागो नहीं, भागो ग्राहक भागो सही सावित होता है।

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