वैश्विक बाजारों में रिकॉर्ड तेजी के बीच जर्मन ऑटो सेक्टर पर गहराता संकट
बाजार के जानकारों के लिए यह हफ्ता काफी अहम साबित हो रहा है। फ्रैंकफर्ट का डैक्स (Dax) इंडेक्स 25,000 अंकों के मनोवैज्ञानिक स्तर को छूने के बेहद करीब है। बुधवार को शुरुआती कारोबार से पहले ही संकेतों ने बता दिया कि बाजार में 0.34 फीसदी की बढ़त है और यह जादुई आंकड़ा अब दूर नहीं है। इस तेजी के पीछे कई बड़े कारण माने जा रहे हैं। सबसे पहले तो अमेरिका और वेनेजुएला के बीच तनाव कम होने से युद्ध की आशंका टली है, जिससे निवेशकों ने राहत की सांस ली है। इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट की उम्मीद और अमेरिकी बाजार के बाहर निवेश करने में बढ़ती दिलचस्पी ने भी बाजार को पंख लगा दिए हैं। तकनीकी रूप से भी डैक्स के 25,300 तक जाने की संभावना जताई जा रही है।
वैश्विक स्तर पर देखें तो वॉल स्ट्रीट से भी सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। डॉव जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 50,000 अंकों की ओर बढ़ रहा है, वहीं यूरोप का यूरोस्टॉक्स-50 भी 6,000 के स्तर की तरफ कदम बढ़ा रहा है। अर्थशास्त्रियों की नजरें अमेरिका और यूरोप के आर्थिक आंकड़ों पर टिकी हैं। अनुमान है कि यूरोजोन में महंगाई दर घटकर 2 फीसदी के लक्ष्य पर आ गई है, जिससे यह उम्मीद जगी है कि अब ब्याज दरों में और बढ़ोतरी नहीं होगी।
कंपनियों का प्रदर्शन और नई साझेदारियां
कॉरपोरेट जगत में भी काफी हलचल है। कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स शो (CES) के दौरान सीमेंस और अमेरिकी चिप दिग्गज एनवीडिया ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में अपनी साझेदारी को और गहरा करने का ऐलान किया है, जिसका असर सीमेंस के शेयरों में शुरुआती तेजी के रूप में देखा गया। वहीं, ऑनलाइन फार्मेसी रेडकेयर ने जर्मनी में ई-प्रेसक्रिप्शन (ई-नुस्खे) के विस्तार का फायदा उठाया है, हालांकि इसकी वृद्धि दर विश्लेषकों की उम्मीदों से थोड़ी कम रही। दूसरी ओर, विश्लेषकों ने लुफ्थांसा और बायर जैसी कंपनियों की रेटिंग को ‘ओवरवेट’ श्रेणी में अपग्रेड किया है, जिससे इनके शेयरों में उछाल आया है, जबकि इवोनिक और टीयूआई (Tui) जैसी कंपनियों के शेयरों पर दबाव देखने को मिला है।
ऑटो इंडस्ट्री पर लागत का बोझ और बढ़ती कीमतें
जहां शेयर बाजार में जश्न का माहौल है, वहीं जमीनी स्तर पर ऑटोमोबाइल सेक्टर भारी दबाव से गुजर रहा है। फोक्सवैगन और ऑडी पार्टनर एसोसिएशन (VAPV) के अध्यक्ष अलेक्जेंडर सॉर-वैगनर ने चेतावनी दी है कि इस साल इन ब्रांड्स की कारों की कीमतें बढ़ सकती हैं। डीलरशिप्स और शोरूम मालिकों के लिए हालात मुश्किल होते जा रहे हैं। बढ़ती ब्याज दरें, महंगी बिजली और कर्मचारियों की बढ़ती तनख्वाह ने मुनाफे के मार्जिन को सिकोड़ दिया है। कुशल कारीगरों की कमी के चलते डीलर अपने कर्मचारियों को रोकने के लिए ज्यादा वेतन और बोनस देने को मजबूर हैं, जिसका सीधा असर उनकी बैलेंस शीट पर पड़ रहा है।
सॉर-वैगनर का कहना है कि निर्माताओं और डीलरों दोनों के पास कीमतों में फेरबदल की गुंजाइश बहुत कम बची है। हालांकि, उन्हें उम्मीद है कि 2026 में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की लीजिंग दरें पारंपरिक पेट्रोल-डीजल गाड़ियों के बराबर आ सकती हैं। अगर ऐसा होता है, तो इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री में सुधार देखने को मिल सकता है।
डीजल इंजन और जर्मन कार निर्माताओं की दुविधा
दिलचस्प बात यह है कि जहां पूरा यूरोप डीजल इंजनों से दूरी बना रहा है, वहीं जर्मनी की दिग्गज कंपनियां—ऑडी, बीएमडब्ल्यू और मर्सिडीज—अब भी डीजल पर दांव लगा रही हैं। आंकड़े बताते हैं कि यूरोप में बिकने वाली हर दस में से सिर्फ एक कार डीजल होती है, लेकिन जर्मन निर्माता ‘डीजलगेट’ स्कैंडल के एक दशक बाद भी नए डीजल इंजन विकसित करने में लगे हैं। यह रणनीति उन्हें उद्योग के सामान्य रुझान के विपरीत खड़ा करती है।
दूसरी तरफ, अमेरिकी बाजार से सकारात्मक खबरें आई हैं। तमाम नियामक अनिश्चितताओं और सब्सिडी खत्म होने की चुनौतियों के बावजूद, 2025 में वहां वाहनों की बिक्री में लगभग 2 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह आंकड़ा 1.6 करोड़ यूनिट्स तक पहुंच गया। अब देखना यह होगा कि क्या जर्मन कार बाजार भी इन चुनौतियों से निपटकर वापसी कर पाता है या बढ़ती लागत और तकनीकी बदलावों के बीच संघर्ष जारी रहेगा।
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